!doctype html> जानकी स्तुति - भइ प्रगट किशोरी (Janaki Stuti - Bhai Pragat Kishori) Lyrics — Vrinda Ke Geet
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Radha स्तोत्रम्

जानकी स्तुति - भइ प्रगट किशोरी

Janaki Stuti - Bhai Pragat Kishori

Published: 21 जून 2026

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हिंदी

भइ प्रगट किशोरी,

धरनि निहोरी,

जनक नृपति सुखकारी ।अनुपम बपुधारी,

रूप सँवारी,

आदि शक्ति सुकुमारी ।

मनि कनक सिंघासन,

कृतवर आसन,

शशि शत शत उजियारी ।

शिर मुकुट बिराजे,

भूषन साजे,

नृप लखि भये सुखारी ।

सखि आठ सयानी,

मन हुलसानी,

सेवहिं शील सुहाई ।

नरपति बड़भागी,

अति अनुरागी,

अस्तुति कर मन लाई ।

जय जय जय सीते,

श्रुतिगन गीते,

जेहिं शिव शारद गाई ।

सो मम हित करनी,

भवभय हरनी,

प्रगट भईं श्री आई ।

नित रघुवर माया,

भुवन निकाया,

रचइ जासु रुख पाई ।

सोइ अगजग माता,

निज जनत्राता,

प्रगटी मम ढिग आई ।

कन्या तनु लीजै,

अतिसुख दीजै,

रुचिर रूप सुखदाई ।

शिशु लीला करिये,

रुचि अनुसरिये,

मोरि सुता हरषाई ।

सुनि भूपति बानी,

मन मुसुकानी,

बनी सुता शिशु सीता ।

तब रोदन ठानी,

सुनि हरषानी,

रानी परम बिनीता ।

लिये गोद सुनैना,

जल भरि नैना,

नाचत गावत गीता ।

यह सुजस जे गावहिं,

श्रीपद पावहिं,

ते न होहिं भव भीता ।

दोहा:

रामचन्द्र सुख करन हित,

प्रगटि मख महि सीय ।

“गिरिधर” स्वामिनि जग जननि,

चरित करत कमनीय । ।

जनकपुर जनकलली जी की जय

अयोध्या रामजी लला की जय

  • गिरिधर
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Category
radha
Type
strotram
Published
21 जून 2026
Tags
radha strotram

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