!doctype html> सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (sampurna sunderkand) Lyrics — Vrinda Ke Geet
sampurna sunderkand — सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड devotional song
Hanuman स्तोत्रम्

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड

sampurna sunderkand

Published: 21 जून 2026

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हिंदी

||आसन ||

कथा प्रारम्भ होत है। सुनहुँ वीर हनुमान ||

राम लखन जानकी। करहुँ सदा कल्याण ||

|| श्री गणेशाय नमः || || रामचरितमानस ||

|| पञ्चम सोपान सुन्दरकाण्ड ||

श्लोक –

शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं,

ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम्,

रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं,

वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूड़ामणिम् ||1 ||

नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये

सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।

भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे

कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च ||2 ||

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं

दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम् |

सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं

रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि ||3 ||

जामवंत के बचन सुहाए | सुनि हनुमंत हृदय अति भाए ||

तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई | सहि दुख कंद मूल फल खाई ||

जब लगि आवौं सीतहि देखी | होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी ||

यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा | चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा ||

सिंधु तीर एक भूधर सुंदर | कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर ||

बार बार रघुबीर सँभारी | तरकेउ पवनतनय बल भारी ||

जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता | चलेउ सो गा पाताल तुरंता ||

जिमि अमोघ रघुपति कर बाना | एही भाँति चलेउ हनुमाना ||

जलनिधि रघुपति दूत बिचारी | तैं मैनाक होहि श्रमहारी ||

हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।

राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम ||1 ||

जात पवनसुत देवन्ह देखा | जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा ||

सुरसा नाम अहिन्ह कै माता | पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता ||

आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा | सुनत बचन कह पवनकुमारा ||

राम काजु करि फिरि मैं आवौं | सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं ||

तब तव बदन पैठिहउँ आई | सत्य कहउँ मोहि जान दे माई ||

कबनेहुँ जतन देइ नहिं जाना | ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना ||

जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा | कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा ||

सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ | तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ ||

जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा | तासु दून कपि रूप देखावा ||

सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा | अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा ||

बदन पइठि पुनि बाहेर आवा | मागा बिदा ताहि सिरु नावा ||

मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा | बुधि बल मरमु तोर मै पावा ||

राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।

आसिष देह गई सो हरषि चलेउ हनुमान || ||

निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई | करि माया नभु के खग गहई ||

जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं | जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं ||

गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई | एहि बिधि सदा गगनचर खाई ||

सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा | तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा ||

ताहि मारि मारुतसुत बीरा | बारिधि पार गयउ मतिधीरा ||

तहाँ जाइ देखी बन सोभा | गुंजत चंचरीक मधु लोभा ||

नाना तरु फल फूल सुहाए | खग मृग बृंद देखि मन भाए ||

सैल बिसाल देखि एक आगें | ता पर धाइ चढेउ भय त्यागें ||

उमा न कछु कपि कै अधिकाई | प्रभु प्रताप जो कालहि खाई ||

गिरि पर चढि लंका तेहिं देखी | कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी ||

अति उतंग जलनिधि चहु पासा | कनक कोट कर परम प्रकासा ||

छं0 – कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।

चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना ||

गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथिन्ह को गनै ||

बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै ||1 ||

बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं।

नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं ||

कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।

नाना अखारेन्ह भिरहिं बहु बिधि एक एकन्ह तर्जहीं ||2 ||

करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं।

कहुँ महिष मानषु धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं ||

एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही।

रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही ||3 ||

पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।

अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार ||3 ||

मसक समान रूप कपि धरी | लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी ||

नाम लंकिनी एक निसिचरी | सो कह चलेसि मोहि निंदरी ||

जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा | मोर अहार जहाँ लगि चोरा ||

मुठिका एक महा कपि हनी | रुधिर बमत धरनीं ढनमनी ||

पुनि संभारि उठि सो लंका | जोरि पानि कर बिनय संसका ||

जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा | चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा ||

बिकल होसि तैं कपि कें मारे | तब जानेसु निसिचर संघारे ||

तात मोर अति पुन्य बहूता | देखेउँ नयन राम कर दूता ||

दोहा – 4

तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।

तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग ||4 ||

प्रबिसि नगर कीजे सब काजा | हृदयँ राखि कौसलपुर राजा ||

गरल सुधा रिपु करहिं मिताई | गोपद सिंधु अनल सितलाई ||

गरुड़ सुमेरु रेनू सम ताही | राम कृपा करि चितवा जाही ||

अति लघु रूप धरेउ हनुमाना | पैठा नगर सुमिरि भगवाना ||

मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा | देखे जहँ तहँ अगनित जोधा ||

गयउ दसानन मंदिर माहीं | अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं ||

सयन किए देखा कपि तेही | मंदिर महुँ न दीखि बैदेही ||

भवन एक पुनि दीख सुहावा | हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा ||

रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।

नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरषि कपिराइ ||5 ||

लंका निसिचर निकर निवासा | इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा ||

मन महुँ तरक करै कपि लागा | तेहीं समय बिभीषनु जागा ||

राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा | हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा ||

एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी | साधु ते होइ न कारज हानी ||

बिप्र रुप धरि बचन सुनाए | सुनत बिभीषण उठि तहँ आए ||

करि प्रनाम पूँछी कुसलाई | बिप्र कहहु निज कथा बुझाई ||

की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई | मोरें हृदय प्रीति अति होई ||

की तुम्ह रामु दीन अनुरागी | आयहु मोहि करन बड़भागी ||

दोहा – 6

तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम।

सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम ||6 ||

सुनहु पवनसुत रहनि हमारी | जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी ||

तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा | करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा ||

तामस तनु कछु साधन नाहीं | प्रीति न पद सरोज मन माहीं ||

अब मोहि भा भरोस हनुमंता | बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता ||

जौ रघुबीर अनुग्रह कीन्हा | तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा ||

सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती | करहिं सदा सेवक पर प्रीती ||

कहहु कवन मैं परम कुलीना | कपि चंचल सबहीं बिधि हीना ||

प्रात लेइ जो नाम हमारा | तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा ||

दोहा – 7

अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।

कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर ||7 ||

जानतहूँ अस स्वामि बिसारी | फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी ||

एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा | पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा ||

पुनि सब कथा बिभीषन कही | जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही ||

तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता | देखी चहउँ जानकी माता ||

जुगुति बिभीषन सकल सुनाई | चलेउ पवनसुत बिदा कराई ||

करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ | बन असोक सीता रह जहवाँ ||

देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा | बैठेहिं बीति जात निसि जामा ||

कृस तन सीस जटा एक बेनी | जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी ||

दोहा – 8

निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।

परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन ||8 ||

तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई | करइ बिचार करौं का भाई ||

तेहि अवसर रावनु तहँ आवा | संग नारि बहु किएँ बनावा ||

बहु बिधि खल सीतहि समुझावा | साम दान भय भेद देखावा ||

कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी | मंदोदरी आदि सब रानी ||

तव अनुचरीं करउँ पन मोरा | एक बार बिलोकु मम ओरा ||

तृन धरि ओट कहति बैदेही | सुमिरि अवधपति परम सनेही ||

सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा | कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा ||

अस मन समुझु कहति जानकी | खल सुधि नहिं रघुबीर बान की ||

सठ सूने हरि आनेहि मोहि | अधम निलज्ज लाज नहिं तोही ||

दोहा – 9

आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान।

परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन ||9 ||

सीता तैं मम कृत अपमाना | कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना ||

नाहिं त सपदि मानु मम बानी | सुमुखि होति न त जीवन हानी ||

स्याम सरोज दाम सम सुंदर | प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर ||

सो भुज कंठ कि तव असि घोरा | सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा ||

चंद्रहास हरु मम परितापं | रघुपति बिरह अनल संजातं ||

सीतल निसित बहसि बर धारा | कह सीता हरु मम दुख भारा ||

सुनत बचन पुनि मारन धावा | मयतनयाँ कहि नीति बुझावा ||

कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई | सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई ||

मास दिवस महुँ कहा न माना | तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना ||

दोहा – 10

भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद।

सीतहि त्रास देखावहि धरहिं रूप बहु मंद ||10 ||

त्रिजटा नाम राच्छसी एका | राम चरन रति निपुन बिबेका ||

सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना | सीतहि सेइ करहु हित अपना ||

सपनें बानर लंका जारी | जातुधान सेना सब मारी ||

खर आरूढ़ नगन दससीसा | मुंडित सिर खंडित भुज बीसा ||

एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई | लंका मनहुँ बिभीषन पाई ||

नगर फिरी रघुबीर दोहाई | तब प्रभु सीता बोलि पठाई ||

यह सपना में कहउँ पुकारी | होइहि सत्य गएँ दिन चारी ||

तासु बचन सुनि ते सब डरीं | जनकसुता के चरनन्हि परीं ||

दोहा – 11

जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच।

मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच ||11 ||

त्रिजटा सन बोली कर जोरी | मातु बिपति संगिनि तैं मोरी ||

तजौं देह करु बेगि उपाई | दुसहु बिरहु अब नहिं सहि जाई ||

आनि काठ रचु चिता बनाई | मातु अनल पुनि देहि लगाई ||

सत्य करहि मम प्रीति सयानी | सुनै को श्रवन सूल सम बानी ||

सुनत बचन पद गहि समुझाएसि | प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि ||

निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी | अस कहि सो निज भवन सिधारी ||

कह सीता बिधि भा प्रतिकूला | मिलहि न पावक मिटिहि न सूला ||

देखिअत प्रगट गगन अंगारा | अवनि न आवत एकउ तारा ||

पावकमय ससि स्त्रवत न आगी | मानहुँ मोहि जानि हतभागी ||

सुनहि बिनय मम बिटप असोका | सत्य नाम करु हरु मम सोका ||

नूतन किसलय अनल समाना | देहि अगिनि जनि करहि निदाना ||

देखि परम बिरहाकुल सीता | सो छन कपिहि कलप सम बीता ||

दोहा – 12

कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारी तब।

जनु असोक अंगार दीन्हि हरषि उठि कर गहेउ ||12 ||

तब देखी मुद्रिका मनोहर | राम नाम अंकित अति सुंदर ||

चकित चितव मुदरी पहिचानी | हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी ||

जीति को सकइ अजय रघुराई | माया तें असि रचि नहिं जाई ||

सीता मन बिचार कर नाना | मधुर बचन बोलेउ हनुमाना ||

रामचंद्र गुन बरनैं लागा | सुनतहिं सीता कर दुख भागा ||

लागीं सुनैं श्रवन मन लाई | आदिहु तें सब कथा सुनाई ||

श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई | कहि सो प्रगट होति किन भाई ||

तब हनुमंत निकट चलि गयऊ | फिरि बैंठीं मन बिसमय भयऊ ||

राम दूत मैं मातु जानकी | सत्य सपथ करुनानिधान की ||

यह मुद्रिका मातु मैं आनी | दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी ||

नर बानरहि संग कहु कैसें | कहि कथा भइ संगति जैसें ||

दोहा – 13

कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास ||

जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास ||13 ||

हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी | सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी ||

बूड़त बिरह जलधि हनुमाना | भयउ तात मों कहुँ जलजाना ||

अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी | अनुज सहित सुख भवन खरारी ||

कोमलचित कृपाल रघुराई | कपि केहि हेतु धरी निठुराई ||

सहज बानि सेवक सुख दायक | कबहुँक सुरति करत रघुनायक ||

कबहुँ नयन मम सीतल ताता | होइहहि निरखि स्याम मृदु गाता ||

बचनु न आव नयन भरे बारी | अहह नाथ हौं निपट बिसारी ||

देखि परम बिरहाकुल सीता | बोला कपि मृदु बचन बिनीता ||

मातु कुसल प्रभु अनुज समेता | तव दुख दुखी सुकृपा निकेता ||

जनि जननी मानहु जियँ ऊना | तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना ||

दोहा – 14

रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर।

अस कहि कपि गद गद भयउ भरे बिलोचन नीर ||14 ||

कहेउ राम बियोग तव सीता | मो कहुँ सकल भए बिपरीता ||

नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू | कालनिसा सम निसि ससि भानू ||

कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा | बारिद तपत तेल जनु बरिसा ||

जे हित रहे करत तेइ पीरा | उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा ||

कहेहू तें कछु दुख घटि होई | काहि कहौं यह जान न कोई ||

तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा | जानत प्रिया एकु मनु मोरा ||

सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं | जानु प्रीति रसु एतेनहि माहीं ||

प्रभु संदेसु सुनत बैदेही | मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही ||

कह कपि हृदयँ धीर धरु माता | सुमिरु राम सेवक सुखदाता ||

उर आनहु रघुपति प्रभुताई | सुनि मम बचन तजहु कदराई ||

दोहा – 15

निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु।

जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु ||15 ||

जौं रघुबीर होति सुधि पाई | करते नहिं बिलंबु रघुराई ||

रामबान रबि उएँ जानकी | तम बरूथ कहँ जातुधान की ||

अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई | प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई ||

कछुक दिवस जननी धरु धीरा | कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा ||

निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं | तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं ||

हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना | जातुधान अति भट बलवाना ||

मोरें हृदय परम संदेहा | सुनि कपि प्रगट कीन्ह निज देहा ||

कनक भूधराकार सरीरा | समर भयंकर अतिबल बीरा ||

सीता मन भरोस तब भयऊ | पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ ||

दोहा – 16

सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल।

प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल ||16 ||

मन संतोष सुनत कपि बानी | भगति प्रताप तेज बल सानी ||

आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना | होहु तात बल सील निधाना ||

अजर अमर गुननिधि सुत होहू | करहुँ बहुत रघुनायक छोहू ||

करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना | निर्भर प्रेम मगन हनुमाना ||

बार बार नाएसि पद सीसा | बोला बचन जोरि कर कीसा ||

अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता | आसिष तव अमोघ बिख्याता ||

सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा | लागि देखि सुंदर फल रूखा ||

सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी | परम सुभट रजनीचर भारी ||

तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं | जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं ||

दोहा – 17

देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु।

रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु ||17 ||

चलेउ नाइ सिरु पैठेउ बागा | फल खाएसि तरु तोरैं लागा ||

रहे तहाँ बहु भट रखवारे | कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे ||

नाथ एक आवा कपि भारी | तेहिं असोक बाटिका उजारी ||

खाएसि फल अरु बिटप उपारे | रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे ||

सुनि रावन पठए भट नाना | तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना ||

सब रजनीचर कपि संघारे | गए पुकारत कछु अधमारे ||

पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा | चला संग लै सुभट अपारा ||

आवत देखि बिटप गहि तर्जा | ताहि निपाति महाधुनि गर्जा ||

दोहा – 18

कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलएसि धरि धूरि।

कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि ||18 ||

सुनि सुत बध लंकेस रिसाना | पठएसि मेघनाद बलवाना ||

मारसि जनि सुत बांधेसु ताही | देखिअ कपिहि कहाँ कर आही ||

चला इंद्रजित अतुलित जोधा | बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा ||

कपि देखा दारुन भट आवा | कटकटाइ गर्जा अरु धावा ||

अति बिसाल तरु एक उपारा | बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा ||

रहे महाभट ताके संगा | गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा ||

तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा | भिरे जुगल मानहुँ गजराजा।

मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई | ताहि एक छन मुरुछा आई ||

उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया | जीति न जाइ प्रभंजन जाया ||

दोहा – 19

ब्रह्म अस्त्र तेहिं साँधा कपि मन कीन्ह बिचार।

जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार ||19 ||

ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहि मारा | परतिहुँ बार कटकु संघारा ||

तेहि देखा कपि मुरुछित भयऊ | नागपास बाँधेसि लै गयऊ ||

जासु नाम जपि सुनहु भवानी | भव बंधन काटहिं नर ग्यानी ||

तासु दूत कि बंध तरु आवा | प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा ||

कपि बंधन सुनि निसिचर धाए | कौतुक लागि सभाँ सब आए ||

दसमुख सभा दीखि कपि जाई | कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई ||

कर जोरें सुर दिसिप बिनीता | भृकुटि बिलोकत सकल सभीता ||

देखि प्रताप न कपि मन संका | जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका ||

दोहा – 20

कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद।

सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद ||20 ||

कह लंकेस कवन तैं कीसा | केहिं के बल घालेहि बन खीसा ||

की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही | देखउँ अति असंक सठ तोही ||

मारे निसिचर केहिं अपराधा | कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा ||

सुन रावन ब्रह्मांड निकाया | पाइ जासु बल बिरचित माया ||

जाकें बल बिरंचि हरि ईसा | पालत सृजत हरत दससीसा।

जा बल सीस धरत सहसानन | अंडकोस समेत गिरि कानन ||

धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता | तुम्ह ते सठन्ह सिखावनु दाता।

हर कोदंड कठिन जेहि भंजा | तेहि समेत नृप दल मद गंजा ||

खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली | बधे सकल अतुलित बलसाली ||

दोहा – 21

जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि।

तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि ||21 ||

जानउँ मैं तुम्हरि प्रभुताई | सहसबाहु सन परी लराई ||

समर बालि सन करि जसु पावा | सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा ||

खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा | कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा ||

सब कें देह परम प्रिय स्वामी | मारहिं मोहि कुमारग गामी ||

जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे | तेहि पर बाँधेउ तनयँ तुम्हारे ||

मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा | कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा ||

बिनती करउँ जोरि कर रावन | सुनहु मान तजि मोर सिखावन ||

देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी | भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी ||

जाकें डर अति काल डेराई | जो सुर असुर चराचर खाई ||

तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै | मोरे कहें जानकी दीजै ||

दोहा – 22

प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि।

गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि ||22 ||

राम चरन पंकज उर धरहू | लंका अचल राज तुम्ह करहू ||

रिषि पुलिस्त जसु बिमल मंयका | तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका ||

राम नाम बिनु गिरा न सोहा | देखु बिचारि त्यागि मद मोहा ||

बसन हीन नहिं सोह सुरारी | सब भूषण भूषित बर नारी ||

राम बिमुख संपति प्रभुताई | जाइ रही पाई बिनु पाई ||

सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं | बरषि गए पुनि तबहिं सुखाहीं ||

सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी | बिमुख राम त्राता नहिं कोपी ||

संकर सहस बिष्नु अज तोही | सकहिं न राखि राम कर द्रोही ||

दोहा – 23

मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान।

भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान ||23 ||

जदपि कहि कपि अति हित बानी | भगति बिबेक बिरति नय सानी ||

बोला बिहसि महा अभिमानी | मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी ||

मृत्यु निकट आई खल तोही | लागेसि अधम सिखावन मोही ||

उलटा होइहि कह हनुमाना | मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना ||

सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना | बेगि न हरहुँ मूढ़ कर प्राना ||

सुनत निसाचर मारन धाए | सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए।

नाइ सीस करि बिनय बहूता | नीति बिरोध न मारिअ दूता ||

आन दंड कछु करिअ गोसाँई | सबहीं कहा मंत्र भल भाई ||

सुनत बिहसि बोला दसकंधर | अंग भंग करि पठइअ बंदर ||

दोहा – 24

कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ।

तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ ||24 ||

पूँछहीन बानर तहँ जाइहि | तब सठ निज नाथहि लइ आइहि ||

जिन्ह कै कीन्हसि बहुत बड़ाई | देखेउँûमैं तिन्ह कै प्रभुताई ||

बचन सुनत कपि मन मुसुकाना | भइ सहाय सारद मैं जाना ||

जातुधान सुनि रावन बचना | लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना ||

रहा न नगर बसन घृत तेला | बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला ||

कौतुक कहँ आए पुरबासी | मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी ||

बाजहिं ढोल देहिं सब तारी | नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी ||

पावक जरत देखि हनुमंता | भयउ परम लघु रुप तुरंता ||

निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं | भई सभीत निसाचर नारीं ||

दोहा – 25

हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।

अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास ||25 ||

देह बिसाल परम हरुआई | मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई ||

जरइ नगर भा लोग बिहाला | झपट लपट बहु कोटि कराला ||

तात मातु हा सुनिअ पुकारा | एहि अवसर को हमहि उबारा ||

हम जो कहा यह कपि नहिं होई | बानर रूप धरें सुर कोई ||

साधु अवग्या कर फलु ऐसा | जरइ नगर अनाथ कर जैसा ||

जारा नगरु निमिष एक माहीं | एक बिभीषन कर गृह नाहीं ||

ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा | जरा न सो तेहि कारन गिरिजा ||

उलटि पलटि लंका सब जारी | कूदि परा पुनि सिंधु मझारी ||

दोहा – 26

पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि।

जनकसुता के आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि ||26 ||

मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा | जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा ||

चूड़ामनि उतारि तब दयऊ | हरष समेत पवनसुत लयऊ ||

कहेहु तात अस मोर प्रनामा | सब प्रकार प्रभु पूरनकामा ||

दीन दयाल बिरिदु संभारी | हरहु नाथ मम संकट भारी ||

तात सक्रसुत कथा सुनाएहु | बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु ||

मास दिवस महुँ नाथु न आवा | तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा ||

कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना | तुम्हहू तात कहत अब जाना ||

तोहि देखि सीतलि भइ छाती | पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती ||

दोहा – 27

जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह।

चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह ||27 ||

चलत महाधुनि गर्जेसि भारी | गर्भ स्त्रवहिं सुनि निसिचर नारी ||

नाघि सिंधु एहि पारहि आवा | सबद किलकिला कपिन्ह सुनावा ||

हरषे सब बिलोकि हनुमाना | नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना ||

मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा | कीन्हेसि रामचन्द्र कर काजा ||

मिले सकल अति भए सुखारी | तलफत मीन पाव जिमि बारी ||

चले हरषि रघुनायक पासा | पूँछत कहत नवल इतिहासा ||

तब मधुबन भीतर सब आए | अंगद संमत मधु फल खाए ||

रखवारे जब बरजन लागे | मुष्टि प्रहार हनत सब भागे ||

दोहा – 28

जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज।

सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज ||28 ||

जौं न होति सीता सुधि पाई | मधुबन के फल सकहिं कि खाई ||

एहि बिधि मन बिचार कर राजा | आइ गए कपि सहित समाजा ||

आइ सबन्हि नावा पद सीसा | मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा ||

पूँछी कुसल कुसल पद देखी | राम कृपाँ भा काजु बिसेषी ||

नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना | राखे सकल कपिन्ह के प्राना ||

सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ | कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ।

राम कपिन्ह जब आवत देखा | किएँ काजु मन हरष बिसेषा ||

फटिक सिला बैठे द्वौ भाई | परे सकल कपि चरनन्हि जाई ||

दोहा – 29

प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करुना पुंज।

पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज ||29 ||

जामवंत कह सुनु रघुराया | जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया ||

ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर | सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर ||

सोइ बिजई बिनई गुन सागर | तासु सुजसु त्रेलोक उजागर ||

प्रभु कीं कृपा भयउ सबु काजू | जन्म हमार सुफल भा आजू ||

नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी | सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी ||

पवनतनय के चरित सुहाए | जामवंत रघुपतिहि सुनाए ||

सुनत कृपानिधि मन अति भाए | पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए ||

कहहु तात केहि भाँति जानकी | रहति करति रच्छा स्वप्रान की ||

दोहा – 30

नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।

लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट ||30 ||

चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही | रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही ||

नाथ जुगल लोचन भरि बारी | बचन कहे कछु जनककुमारी ||

अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना | दीन बंधु प्रनतारति हरना ||

मन क्रम बचन चरन अनुरागी | केहि अपराध नाथ हौं त्यागी ||

अवगुन एक मोर मैं माना | बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना ||

नाथ सो नयनन्हि को अपराधा | निसरत प्रान करिहिं हठि बाधा ||

बिरह अगिनि तनु तूल समीरा | स्वास जरइ छन माहिं सरीरा ||

नयन स्त्रवहि जलु निज हित लागी | जरैं न पाव देह बिरहागी।

सीता के अति बिपति बिसाला | बिनहिं कहें भलि दीनदयाला ||

दोहा – 31

निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति।

बेगि चलिय प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति ||31 ||

सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना | भरि आए जल राजिव नयना ||

बचन काँय मन मम गति जाही | सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही ||

कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई | जब तव सुमिरन भजन न होई ||

केतिक बात प्रभु जातुधान की | रिपुहि जीति आनिबी जानकी ||

सुनु कपि तोहि समान उपकारी | नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी ||

प्रति उपकार करौं का तोरा | सनमुख होइ न सकत मन मोरा ||

सुनु सुत उरिन मैं नाहीं | देखेउँ करि बिचार मन माहीं ||

पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता | लोचन नीर पुलक अति गाता ||

दोहा – 32

सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत।

चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत ||32 ||

बार बार प्रभु चहइ उठावा | प्रेम मगन तेहि उठब न भावा ||

प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा | सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा ||

सावधान मन करि पुनि संकर | लागे कहन कथा अति सुंदर ||

कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा | कर गहि परम निकट बैठावा ||

कहु कपि रावन पालित लंका | केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका ||

प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना | बोला बचन बिगत अभिमाना ||

साखामृग के बड़ि मनुसाई | साखा तें साखा पर जाई ||

नाघि सिंधु हाटकपुर जारा | निसिचर गन बिधि बिपिन उजारा।

सो सब तव प्रताप रघुराई | नाथ न कछू मोरि प्रभुताई ||

दोहा – 33

ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकुल।

तब प्रभावँ बड़वानलहिं जारि सकइ खलु तूल ||33 ||

नाथ भगति अति सुखदायनी | देहु कृपा करि अनपायनी ||

सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी | एवमस्तु तब कहेउ भवानी ||

उमा राम सुभाउ जेहिं जाना | ताहि भजनु तजि भाव न आना ||

यह संवाद जासु उर आवा | रघुपति चरन भगति सोइ पावा ||

सुनि प्रभु बचन कहहिं कपिबृंदा | जय जय जय कृपाल सुखकंदा ||

तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा | कहा चलैं कर करहु बनावा ||

अब बिलंबु केहि कारन कीजे | तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे ||

कौतुक देखि सुमन बहु बरषी | नभ तें भवन चले सुर हरषी ||

दोहा – 34

कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ।

नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ ||34 ||

प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा | गरजहिं भालु महाबल कीसा ||

देखी राम सकल कपि सेना | चितइ कृपा करि राजिव नैना ||

राम कृपा बल पाइ कपिंदा | भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा ||

हरषि राम तब कीन्ह पयाना | सगुन भए सुंदर सुभ नाना ||

जासु सकल मंगलमय कीती | तासु पयान सगुन यह नीती ||

प्रभु पयान जाना बैदेहीं | फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं ||

जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई | असगुन भयउ रावनहि सोई ||

चला कटकु को बरनैं पारा | गर्जहि बानर भालु अपारा ||

नख आयुध गिरि पादपधारी | चले गगन महि इच्छाचारी ||

केहरिनाद भालु कपि करहीं | डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं ||

छं0 – चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे।

मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किन्नर दुख टरे ||

कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं।

जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं ||1 ||

सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई।

गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ट कठोर सो किमि सोहई ||

रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी।

जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी ||2 ||

दोहा – 35

एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर।

जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर ||35 ||

उहाँ निसाचर रहहिं ससंका | जब ते जारि गयउ कपि लंका ||

निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा | नहिं निसिचर कुल केर उबारा ||

जासु दूत बल बरनि न जाई | तेहि आएँ पुर कवन भलाई ||

दूतन्हि सन सुनि पुरजन बानी | मंदोदरी अधिक अकुलानी ||

रहसि जोरि कर पति पग लागी | बोली बचन नीति रस पागी ||

कंत करष हरि सन परिहरहू | मोर कहा अति हित हियँ धरहु ||

समुझत जासु दूत कइ करनी | स्त्रवहीं गर्भ रजनीचर धरनी ||

तासु नारि निज सचिव बोलाई | पठवहु कंत जो चहहु भलाई ||

तब कुल कमल बिपिन दुखदाई | सीता सीत निसा सम आई ||

सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें | हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें ||

दोहा – 36

राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक।

जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक ||36 ||

श्रवन सुनी सठ ता करि बानी | बिहसा जगत बिदित अभिमानी ||

सभय सुभाउ नारि कर साचा | मंगल महुँ भय मन अति काचा ||

जौं आवइ मर्कट कटकाई | जिअहिं बिचारे निसिचर खाई ||

कंपहिं लोकप जाकी त्रासा | तासु नारि सभीत बड़ि हासा ||

अस कहि बिहसि ताहि उर लाई | चलेउ सभाँ ममता अधिकाई ||

मंदोदरी हृदयँ कर चिंता | भयउ कंत पर बिधि बिपरीता ||

बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई | सिंधु पार सेना सब आई ||

बूझेसि सचिव उचित मत कहहू | ते सब हँसे मष्ट करि रहहू ||

जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं | नर बानर केहि लेखे माही ||

दोहा – 37

सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।

राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास ||37 ||

सोइ रावन कहुँ बनि सहाई | अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई ||

अवसर जानि बिभीषनु आवा | भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा ||

पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन | बोला बचन पाइ अनुसासन ||

जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता | मति अनुरुप कहउँ हित ताता ||

जो आपन चाहै कल्याना | सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना ||

सो परनारि लिलार गोसाईं | तजउ चउथि के चंद कि नाई ||

चौदह भुवन एक पति होई | भूतद्रोह तिष्टइ नहिं सोई ||

गुन सागर नागर नर जोऊ | अलप लोभ भल कहइ न कोऊ ||

दोहा – 38

काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ।

सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत ||38 ||

तात राम नहिं नर भूपाला | भुवनेस्वर कालहु कर काला ||

ब्रह्म अनामय अज भगवंता | ब्यापक अजित अनादि अनंता ||

गो द्विज धेनु देव हितकारी | कृपासिंधु मानुष तनुधारी ||

जन रंजन भंजन खल ब्राता | बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता ||

ताहि बयरु तजि नाइअ माथा | प्रनतारति भंजन रघुनाथा ||

देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही | भजहु राम बिनु हेतु सनेही ||

सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा | बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा ||

जासु नाम त्रय ताप नसावन | सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन ||

दोहा – 39

बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस।

परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस ||39(क) ||

मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठई यह बात।

तुरत सो मैं प्रभु सन कही पाइ सुअवसरु तात ||39(ख) ||

माल्यवंत अति सचिव सयाना | तासु बचन सुनि अति सुख माना ||

तात अनुज तव नीति बिभूषन | सो उर धरहु जो कहत बिभीषन ||

रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ | दूरि न करहु इहाँ हइ कोऊ ||

माल्यवंत गृह गयउ बहोरी | कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी ||

सुमति कुमति सब कें उर रहहीं | नाथ पुरान निगम अस कहहीं ||

जहाँ सुमति तहँ संपति नाना | जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना ||

तव उर कुमति बसी बिपरीता | हित अनहित मानहु रिपु प्रीता ||

कालराति निसिचर कुल केरी | तेहि सीता पर प्रीति घनेरी ||

दोहा – 40

तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार।

सीत देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार ||40 ||

बुध पुरान श्रुति संमत बानी | कही बिभीषन नीति बखानी ||

सुनत दसानन उठा रिसाई | खल तोहि निकट मुत्यु अब आई ||

जिअसि सदा सठ मोर जिआवा | रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा ||

कहसि न खल अस को जग माहीं | भुज बल जाहि जिता मैं नाही ||

मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती | सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती ||

अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा | अनुज गहे पद बारहिं बारा ||

उमा संत कइ इहइ बड़ाई | मंद करत जो करइ भलाई ||

तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा | रामु भजें हित नाथ तुम्हारा ||

सचिव संग लै नभ पथ गयऊ | सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ ||

दोहा – 41

रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि।

मै रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि ||41 ||

अस कहि चला बिभीषनु जबहीं | आयूहीन भए सब तबहीं ||

साधु अवग्या तुरत भवानी | कर कल्यान अखिल कै हानी ||

रावन जबहिं बिभीषन त्यागा | भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा ||

चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं | करत मनोरथ बहु मन माहीं ||

देखिहउँ जाइ चरन जलजाता | अरुन मृदुल सेवक सुखदाता ||

जे पद परसि तरी रिषिनारी | दंडक कानन पावनकारी ||

जे पद जनकसुताँ उर लाए | कपट कुरंग संग धर धाए ||

हर उर सर सरोज पद जेई | अहोभाग्य मै देखिहउँ तेई ||

दोहा – 42

जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ।

ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ ||42 ||

एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा | आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा ||

कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा | जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा ||

ताहि राखि कपीस पहिं आए | समाचार सब ताहि सुनाए ||

कह सुग्रीव सुनहु रघुराई | आवा मिलन दसानन भाई ||

कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा | कहइ कपीस सुनहु नरनाहा ||

जानि न जाइ निसाचर माया | कामरूप केहि कारन आया ||

भेद हमार लेन सठ आवा | राखिअ बाँधि मोहि अस भावा ||

सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी | मम पन सरनागत भयहारी ||

सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना | सरनागत बच्छल भगवाना ||

दोहा – 43

सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।

ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि ||43 ||

कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू | आएँ

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Bhakti Mela (भक्ति मेला)

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Song Details

Category
hanuman
Type
strotram
Published
21 जून 2026
Tags
hanuman strotram

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